
क्रांति पथ न्यूज
पुरोलाuttarkashi : आज के डिजिटल युग में सूचना का आदान-प्रदान जितना सुगम हुआ है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। एक समय था जब पत्रकारिता को ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ माना जाता था और इस क्षेत्र में आने के लिए कड़ी मेहनत, विशेष शैक्षणिक योग्यता और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता होती थी। लेकिन आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने इस परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर एक पेज बनाकर खुद को पत्रकार घोषित करने की होड़ ने पत्रकारिता की गरिमा पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
परंपरागत पत्रकारिता में शैक्षिक योग्यता के साथ भाषा पर पकड़ और समाचार के संपादन की समझ अनिवार्य होती थी। लेकिन आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पत्रकार बनने के लिए केवल एक स्मार्टफोन की जरूरत है। सोशल मीडिया पर पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य जनहित के बजाय ‘रीच’ (Reach) और ‘व्यूज’ बटोरना हो गया है। अधिक से अधिक लाइक पाने की चाहत में तथ्यों की जांच किए बिना ही खबरें प्रसारित कर दी जाती हैं सनसनीखेज हेडलाइन बनाना और लोगों की भावनाओं को भड़काना आज की डिजिटल पत्रकारिता का एक काला पक्ष बन चुका है।
बिना किसी संस्थागत नियंत्रण के, कई लोग पत्रकारिता की आड़ में निजी स्वार्थ साध रहे हैं। इनके ऊपर किसी संपादक या संस्थान का दबाव नहीं होता, इसलिए ये अपनी मर्जी से किसी की भी छवि खराब करने या उसे महिमामंडित करने का काम करते हैं।
आज के दौर में डिजिटल पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चर्चा करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह पवित्र पेशा अपराध का सुरक्षा कवच बनने लगे, तो खामोश रहना भी एक अपराध है। भारतीय प्रेस परिषद को अब जागना ही होगा। आज गली-मोहल्लों में ‘स्वयंभू पत्रकारों’ की बाढ़ आ गई है, जिनके पास न तो शैक्षिक योग्यता है और न ही पत्रकारिता के सिद्धांतों की समझ। उनके लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म ही महज एक ऐसा लाइसेंस है जिसके जरिए वे समाज में खौफ पैदा कर सकें और अपनी जेबें भर सकें।
एक दौर था जब पत्रकारिता को ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ कहा जाता था और इस क्षेत्र में आने के लिए शब्दों की मर्यादा, तथ्यों की परख और एक गहरी सामाजिक समझ अनिवार्य थी। लेकिन आज गलियों में घूमते ‘माइक’ और गले में लटके ‘फर्जी आईडी कार्ड’ ने इस पेशे की गरिमा को एक चौराहे पर खड़ा कर दिया है।
विडंबना देखिए, जिस पत्रकार का काम समाज की गंदगी साफ करना था, आज उनमें से कुछ खुद गंदगी फैला रहे हैं। ‘पत्रकारिता’ अब ‘ठेकेदारी’ का नया रास्ता बन गई है। सरकारी विभागों में अधिकारियों पर धौंस जमाकर ठेके हथियाना और काम न मिलने पर उन्हें ब्लैकमेल करना इन स्वयंभू पत्रकारों का मुख्य पेशा बन चुका है। जो लोग कभी समाज के किसी कोने में तवज्जो पाने के लायक नहीं थे, वे आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स के दम पर रौब झाड़ रहे हैं और अवैध कमाई कर रहे हैं।
अब वक्त आ गया है कि प्रेस परिषद एक सख्त लक्ष्मण रेखा खींचें। हर कैमरा थामने वाला या सोशल मीडिया पर पेज चलाने वाला ‘पत्रकार’ नहीं हो सकता। अगर आज इन पर नकेल नहीं कसी गई, तो लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ पूरी तरह ढह जाएगा।
पत्रकारिता कोई शौक या उगाही का मंच नहीं है, यह एक जिम्मेदारी है। अगर आज पत्रकार की परिभाषा तय नहीं की गई, तो वह दिन दूर नहीं जब वास्तविक पत्रकारिता का गला घोंट दिया जाएगा और केवल ‘रौब’ दिखाने वाले स्वयंभू चेहरों का बोलबाला होगा। पत्रकारिता को ‘बाजारू’ होने से बचाने के लिए एक सख्त लक्ष्मण रेखा खींचना अनिवार्य है।
इन स्वयंभू पत्रकारों ने पत्रकारिता को ‘कमाई का जरिया’ बना दिया है। इनके पास खबरों की समझ नहीं होती, बल्कि ये कमियों की तलाश में रहते हैं ताकि उसे सोशल मीडिया पर उछालने की धमकी देकर उगाही कर सकें। इस ‘डिजिटल गंदगी’ के कारण उन पत्रकारों का अस्तित्व खतरे में है जिन्होंने दशकों तक अपनी कलम से समाज को आइना दिखाया है।
आज किसी भी प्रिंटिंग प्रेस या बाजार की दुकान से एक फर्जी आईडी कार्ड बनवाना और ऑनलाइन एक सस्ता माइक खरीदना किसी को भी ‘पत्रकार’ की पदवी दे देता है। बिना किसी शैक्षिक योग्यता और बिना यह जाने कि ‘प’ (पत्रकारिता) की परिभाषा क्या है, लोग खुद को प्रेस का प्रतिनिधि घोषित कर रहे हैं। इनके लिए पत्रकारिता कोई मिशन नहीं, बल्कि समाज में ‘रौब’ जमाने और अवैध कमाई करने का एक जरिया मात्र बन गई है।
अभिव्यक्ति की आजादी सबको है, लेकिन पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार को सोशल मीडिया पर समाचार चलाने वाले पेजों के लिए न्यूनतम योग्यता और पंजीकरण के कड़े नियम बनाने चाहिए। पाठकों को भी यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो ‘खबर’ नहीं होती। सूचना के स्रोत की विश्वसनीयता की जांच करना स्वयं पाठकों की भी जिम्मेदारी है।
सोशल मीडिया ने निस्संदेह आम आदमी को आवाज दी है और कई दबे हुए मुद्दों को मुख्यधारा में लाया है, लेकिन इसे ‘पत्रकारिता’ का नाम देना जल्दबाजी होगी। पत्रकारिता केवल सूचना देना नहीं, बल्कि तथ्यों की शुद्धता और समाज के प्रति जवाबदेही का नाम है। यदि समय रहते ‘भीड़’ और ‘पत्रकार’ के बीच की रेखा स्पष्ट नहीं की गई, तो लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो देगा।